हाथरस काण्ड में ADG का दावा कितना सही? क्या कहता है कानून

 

हाथरस गैंगरेप पीड़िता की निर्मम हत्या के बाद और उसके पहले से ही पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है।हाथरस केस में पुलिस कह रही है रेप नहीं हुआ, तो फिर प्राइवेट पार्ट इस तरह चोटिल कैसे है कि 10-12 दिन तक ब्लीडिंग बंद नहीं हुई. अगर अप्राकृतिक यौनाचार भी हुआ, तो हैवानियत की हद है और ऐसे में कठोर सजा का प्रावधान भारतीय दंड संहिता में है।

 उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पीड़िता की मौत गला घोंटने के कारण हुई है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि उसके साथ बलात्कार हुआ था. हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि उसके प्राइवेट पार्ट में गंभीर चोट थी.

आइये जानते है कि कानून इस मामले में क्या कहता है।

आईपीसी की धारा 375 के अनुसार जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसकी सहमति के बिना, उसे डरा धमका कर या फिर महिला के होश में नहीं होने पर संभोग करता है, तो उसे बलात्कार कहते हैं. चाहे संभोग की क्रिया पूरी हुई हो अथवा नहीं उसे कानूनन बलात्कार ही कहा जायेगा. कानून के अनुसार अगर महिला की सहमति नहीं है तो फिर चाहे महिला के शरीर के साथ प्राकृतिक या अप्राकृतिक तरीके से छेड़छाड़ की गयी हो उसे बलात्कार ही कहा जायेगा. उसके प्राइवेट पार्ट में किसी वस्तु को डालना भी रेप के श्रेणी में ही आता है.

  निर्भया कांड के बाद बलात्कार के लिए कठोर सजा के प्रावधान किए गए है। आरोपी पर धारा 376 के तहत मुकदमा चलता है। पुलिस द्वारा जांच पड़ताल के बाद इकट्ठे किये गए सबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर दोनों पक्षों के वकील दलीलें पेश करते हैं और अपराध साबित होने पर कम से कम सात साल व अधिकतम 10 साल तक कड़ी सजा और आजीवन कारावास दिए जाने का प्रावधान है. गैंगरेप के मामले में 20 साल से आजीवन कारावास तक की सजा है.