संवेदनशीलता से जीने की कला सिखाये शिक्षा

अविजीत पाठक
पिछले सालों के दौरान हम लोगों ने शिक्षा का स्वरूप कितना कुरूप बना डाला है! इतना कि इसे बच्चे की जाग्रत बुद्धिमत्ता और रट्टा मारने के बीच फर्क तक नहीं पता, न ही ज्ञान के अंत:प्रस्फुटन और वर्गीकरण के बीच, और तो और, न ही जिंदगी के यथार्थ और किताबी जानकारी के बीच के अंतर का भान है। इसलिए यह हैरानी की बात है कि महामारी की इस घड़ी में भी, जब मौत केवल आंकड़ा भर बनकर रह गई और हर शह उल्टी हुई पड़ी है, हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था ऑनलाइन अध्यापन से पार नहीं देख पा रही है और न ही परीक्षा लेने जैसे रिवायती तरीकों से! इसकी बला से कि छात्र हों या उनके अभिभावक अथवा आम समाज, जो पहले से ही कोरोना की वजह से अत्यंत मानसिक संत्रास से गुजर रहे हैं। उनके अंदर बड़े स्तर पर डर छाया हुआ है। हमें बताया जा रहा है कि ऑनलाइन कक्षाएं चलनी चाहिए, और उस पर वही पुराने ढर्रे वाले पाठ्यक्रम पर पढ़ाई करनी है और परीक्षाएं भी लेनी हैं। अतएव मैं उन अभिभावकों को दाद देता हूं जो सीबीएससी द्वारा जुलाई में परीक्षा आयोजित करने के निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में गए हैं।
हम सभी को—अभिभावक, अध्यापक, विद्यार्थी और चिंतातुर नागरिक, जो कोई अभी भी जीवन-सुदृढ़ता और नैतिकता वाली अर्थपूर्ण शिक्षा प्रणाली के हामी हैं, उन्हें एकजुट होना होगा। नई मिसाल बनाने वाला प्रस्ताव रखना होगा। वर्तमान में, जब प्रगति और विकास के तमाम अन्य रिवायती सिद्धांत धराशायी हुए पड़े हैं, अगर हम यह नहीं कर पाए तो खुद से धोखा करने जैसा होगा, यानी हम सोच नहीं पा रहे कि कोरोना के बाद वाली दुनिया में हमारे बच्चे किस तरह बड़े होंगे।
सबसे पहले तो यह अहसास करना और खुलकर कहना महत्वपूर्ण है कि परीक्षाएं बतौर एक शक्ति प्रदर्शन आयोजन, छोटे बच्चों को जीवन गुजारने का कारण देने और अनुशासन में बनाए रखने के उद्देश्य से बनाई गई हैं। यह उन्हें आपसी तुलना करने और पैमाइश के पैमाने पर रखने का सबब देती हैं। इसके परिणामस्वरूप अत्यंत-प्रतिस्पर्धात्मकता, डाह और परपीडऩ जैसी मानसिकता की जमीन तैयार हो जाती है। साथ ही उक्त भावनाएं पैदा करने वाले को सिस्टम की वजह से अर्थपूर्ण शिक्षा प्राप्ति से जुड़ा गुणवत्तायुक्त अनुभव प्राप्त करने से छात्रों को महरूम कर देती है। मसलन विलियम वर्ड्सवर्थ और रवींद्रनाथ टैगोर की कविताएं पढऩे से जो आंतरिक आह्लाद उत्पन्न होता है, जैसा आनंद खुले आकाश को निहारने पर आता है या सौरमंडल के नक्षत्रों को ढूंढऩे में जो मजा मिलता है या वैसी रचनात्मक परिपूर्णता का अहसास जब एक बच्चा हाथ में पकड़ी फुटबाल का आयतन नापता है और ठीक उसी वक्त एक गोले की ज्यामिति भी जान जाता है। बतौर एक ‘परीक्षा-वीरÓ एक बच्चे को जिंदगी व्यर्थ करने वाली रटंत प्रकिया अपनाने, अभ्यास परीक्षाओं में खपने और कोचिंग केंद्रों एवं गाइड पुस्तकों में दी जाने वाली जानकारी रूपी गोली को आनन-फानन में निगलना पड़ता है। इसलिए हमें किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए, सीबीएसई के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाने वाली अंग्रेजी और किसी की साहित्यिक योग्यता एवं सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच 99 फीसदी कोई संबंध नहीं होता है, इसी तरह भौतिकी में 100 प्रतिशत लाने वाले का वैज्ञानिक रुझान से वाकई संबंध हो, यह भी जरूरी नहीं।
ज्ञान की उन्नति को जरा भी हानि नहीं पहुंचेगी अगर महामारी के वर्तमान समय में स्कूल अथवा विश्वविद्यालय वार्षिक परीक्षाएं लेने के रिवायती उपक्रम को निभाने से मना कर दें। साथ ही नतीजे पिछली परीक्षाओं में विद्यार्थी के प्रदर्शन के आधार पर निकाल दें। इससे हमारे बच्चे भी अत्यंत व्यग्रता से बच सकेंगे और हो सकता है, इस झमेले से बचे वक्त के दौरान वे आत्मचिंतन कर पाएं, जो डर और मृत्यु, विज्ञान और अनिश्चितता, कोरोना बीमारी और इससे उपजने वाले सामाजिक संत्रास को लेकर मनन करने के लिए जरूरी है। बच्चों के लिए शिक्षा विभाग के कर्ताधर्ताओं द्वारा सोपान के तौर पर तय की गई उत्तम ग्रेड सूची की जगह संवेदनशीलता अथवा जीवन जीने की सूक्ष्म कला सीखने-सिखाने की जरूरत ज्यादा है। तथ्य तो यह है कि हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली की चाहत हो और इसके लिए लडऩे की जरूरत है, जिसका जोर बच्चों के आंतरिक बोध प्रस्फुटन, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास, प्रकृति और समाज से जुड़ाव और जीवन की रोजमर्रा की चुनौतियां से निपटने पर हो। जो विद्यार्थी को किताबी ज्ञान और व्यावहारिकता के बीच रिश्ता, किताबी और वास्तविक जिंदगी, विज्ञान और नैतिकता के बीच संबंधों पर आधारित हो। क्यों हर वक्त हम लोग बच्चों की परीक्षाएं लेने के प्रति इतनी शिद्दत से आसक्त हैं?
दूसरा, हमें अध्यापक होने और अध्यापन की कला के अर्थ को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है। यह अफसोसनाक है कि मौजूदा व्यवस्था ने अध्यापक को शिक्षा रूपी मशीन में एक यंत्रवत् मानव या आदेश मानने वाला पुर्जा बना डाला है। एक अध्यापक आधिकारिक पाठ्यक्रम और विद्यार्थियों के बीच महज मध्यस्थ बनकर रह गया है। लगता है उसका काम केवल पाठ्यक्रम को पूरा करवाना, कक्षा में अनुशासन बनाए रखना, परीक्षा की प्रक्रिया लागू करना, ग्रेड अथवा नंबर देना, उच्च अधिकारियों को डाटा मुहैया करवाने का रह गया है। इसलिए हम लगभग भूल चुके हैं कि बतौर अध्यापक उसकी भूमिका बच्चों तक अपनी बात प्रभावशाली ढंग से पहुंचाने वाला वक्ता, मित्र और उपचार करने वाले की है। हमारा काम केवल जीव-विज्ञान और इतिहास के पाठ्यक्रम को पूरा करवाने, विज्ञान या सामाजिक विषयों को पढ़ाने तक ही सीमित न रहे बल्कि उम्मीद की जाती है कि अध्यापक को युवा मस्तिष्क से जुडऩे वाला, एक उत्प्रेरक और हाथ पकड़कर जिंदगी के उतार-चढ़ाव से निपटने हेतु तौर-तरीके सिखाने वाला होना चाहिए।
उदाहरण के लिए एक अच्छा अध्यापक अपने छात्र से केवल यह रटने के लिए नहीं कहेगा कि गांधी-इर्विन समझौता किस तारीख को हुआ था, बल्कि वह उन्हें 1946 में नोआखली में गांधी जी के असाधारण नेतृत्व की कहानियों से भी अवगत करवाएगा। या फिर कहें तो मौजूदा महामारी के वक्त जब मौत और जिंदगी अपना मतलब खो चुकी है, ऐसे में एक अध्यापक ऑनलाइन होकर थर्मोडायनेमिक्स के सिद्धांत पढ़ाने तक खुद को सीमित न रखकर, विद्यार्थियों के मन में फिलहाल समाये भय और व्यग्रता को भी सुने, उनका संत्रास दूर करने के लिए टैगोर की गीतांजलि की कविता पढ़े और प्यार एवं प्रार्थना के पवित्र पल भी पैदा करे।
जिंदगी को शालीनता और अर्थपूर्ण तरीके से जीना चाहिए और स्कूल-कॉलेज के इम्तिहानों को सीखने के सोपान के तौर पर नहीं लेना चाहिए। इसलिए इस मोड़ पर हम सबको साथ-साथ चलना है और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की परिकल्पना करनी होगी, जिसमें कोरोना के बाद वाली दुनिया में प्यार, आपसी देख-भाल और आंतरिक शिक्षा का प्रसार हो सके। जीवन में सकारात्मक सोच की भावना को पुष्ट करने को बनी शिक्षा व्यवस्था को शिक्षा क्षेत्र के मठाधीशों और ज्ञान के व्यापारियों के गठजोड़ के चंगुल से छुड़वाना होगा।