अपने ही बुजुर्गों के प्रति इतनी संवेदनहीनता कहां से आती कि उन्हें अस्सी या नब्बे साल की उम्र में बेहिचक अकेले और असुरक्षित घरों में छोड़ जाते..!

समाज व पुलिस की कोताही से लेकर समाज के तेजी से बदलते स्वरूप ने शहरों-महानगरों में रहने वाले बुजुर्गों के सामने बहुस्तरीय समस्याएं,आखिर जिम्मेदार?

ऐसे रिश्तों के सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी,जो बुजुर्गों को अपने साथ रखना जरूरी नहीं समझतें?

हालहि में दिल्ली में गठित एक घटना ने सभी को हिलाकर रख दिया जब डकैती के दौरान एक बुजुर्ग महिला की हत्या को अंजाम दिया तथा पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था से लेकर सामाजिक सहयोग तक के मामले में ऐसा कौन-सी स्थिति बन रही है कि चार लुटेरे किसी बुजुर्ग दंपती के घर में घुस कर इतने बड़े अपराध को अंजाम देकर भाग जाते हैं!यह जो घटना सामने आई है उससे यही लगता है कि पूर्णबंदी की सख्ती में ढील के बाद एक बार फिर अपराधियों का मनोबल बढ़ने लगा है।सफदरजंग एनक्लेव इलाके में कई दिन पूर्व रात में विदेश मंत्रालय से सेवानिवृत्त हो चुके एक पनचानबे वर्षीय अधिकारी के घर उनके ही सुरक्षा गार्ड और उसके साथियों ने आभूषणों और पैसों की लूटपाट की और विरोध करने पर उनकी अट्ठासी साल की पत्नी की गला रेत कर हत्या कर दी। निश्चित रूप से इस घटना को अंजाम देने वाले लुटेरों के भीतर यदि कोई डर नहीं था तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है!पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था से लेकर सामाजिक सहयोग तक के मामले में ऐसा कौन-सी स्थिति बन रही है कि चार लुटेरे किसी बुजुर्ग दंपती के घर में घुस कर इतने बड़े अपराध को अंजाम देकर भाग जाते हैं! हालांकि इस घटना के बाद खबर मिलने पर पुलिस ने तत्परता दिखाई और नेपाल भाग रहे अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन सवाल है कि हत्या और डकैती की घटना हो जाने और उसमें किसी लाचार की जान चली जाने के बाद ऐसी तत्परता किस काम की!जब कि सभी राज्यों की पुलिस को चाहिए कि ऐसे बुजर्गों जो अकेले रहते है उनका एक रजिस्टर बनाकर उनके हालचाल व सुरक्षा समय समय पर लेने के लिए एक पुलिस दस्ता होना चाहिए जो उनकी देखभाल कर सके,क्योंकि ज्यादार बड़ी कालोनियों व महानगरों में अक्सर बच्चे अपने पिता माता और बड़े बुजुर्ग को अकेला छोड़कर या तो दूसरे देश या कही दूर जाकर नोकरी पैसा में लगे रहते है।
लेकिन वही सवाल यह भी है कि इन बदमाशो को इस डकैती की घटना को अंजाम देने का मनोबल कहां से आया! अगर पुलिस महकमा इस सहायता कार्यक्रम को लेकर संवेदनशील होती तो उसे यह गौर करने की भी जरूरत है कि उसकी ड्यूटी में लापरवाही कहां हुई!
लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह भी है कि रात आठ-नौ बजे ही आसपास के पडोशी सभी लोग इतने बेखबर कैसे हो गए कि किसी को इतना सब कुछ होने की भनक तक नहीं लगी। निश्चित रूप से यह एक आपराधिक घटना है और इस मामले में कार्रवाई पुलिस को ही करना है। लेकिन सच यह है कि पुलिस की कोताही से लेकर समाज के तेजी से बदलते स्वरूप ने शहरों-महानगरों में रहने वाले बुजुर्गों के सामने बहुस्तरीय समस्याएं पैदा की हैं।
अपराधियों और अपराध की घटनाओं की रोकथाम में पुलिस की नाकामी के साथ-साथ एक अहम पहलू यह भी है कि समाज में छोटे परिवारों के चलन की वजह से हमारे बुजुर्ग कई तरह की त्रासद मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।ताजा घटना में पीड़ित बुजुर्ग दंपती घर में अकेले रहते थे,उनके दो बेटों की मौत हो चुकी है और उनके बाकी पारिवारिक रिश्तेदार अमेरिका में रहते हैं। आखिर उनके रिश्तेदारों के सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी है,जिनके चलते उन्होंने बुजुर्ग दंपती को अपने साथ रखना जरूरी नहीं समझा? ऐसी स्थिति में बुजुर्ग आखिर अकेलेपन की मुश्किलों से लेकर किस-किस तरह के संकट का सामना कब तक कर सकते हैं!कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने और सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाने की जवाबदेही पुलिस की है, लेकिन खुद को आधुनिक बताने और दुनिया को मुट्ठी में करने वाले लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि उनके भीतर अपने ही बुजुर्गों के प्रति इतनी संवेदनहीनता कहां से आती है कि वे उन्हें अस्सी या नब्बे साल की उम्र में भी बेहिचक अकेले और असुरक्षित छोड़े रहते हैं